मोदी मार्का विदेश नीति: काबुल से तेल अवीव तक 

मोदी जी तेल अवीव से लौट आए हैं। प्रत्येक संघी स्वयंसेवक की सर्वोच्च इच्छा और अभिलाषा होती है कि वह अपने पितृभूमि का दर्शन जीवन में एक बार अवश्य करें। इस अर्थ में मोदी जी संघ परिवार के सबसे भाग्यशाली स्वयंसेवक बन गए हैं। जिन्हें दो बार संघ के वैचारिक प्रेरणा स्रोत (जिसे मोदी जी ने ”फादर ऑफ द नेशन” घोषित किया) इजरायल का दर्शन करने का सौभाग्य मिला है। जिंदगी में सर्वोच्च इच्छा लिए गोलवलकर से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक इस दुनिया से विदा हो गए। लेकिन उन्हें जीवनकाल में आदर्श पितृराष्ट्र की राजधानी तेल अवीव की धूल माथे पर लगाने का शुभ अवसर नहीं मिला। दुनिया के तीन बड़े धर्मों का पवित्र स्थल यूरोसलम इजरायली कब्जे में है।

लेकिन हिंदुत्ववादियों की पितृभूमि तेलअवीव है। जब अमेरिका और यूरोपीय उपनिवेशवादियों ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बलपूर्वक फिलिस्तीन क्षेत्र में एक कृत्रिम यहूदी देश इजरायल की आधारशिला रखी, तभी से भारत के संघ मार्का राष्ट्रवादियों के लिए तेलअवीव पवित्र तीर्थस्थल और इसराइल प्रेरणास्रोत है। (इसके पहले उनका प्रेरणास्रोत और पवित्र स्थल नाजी मुख्यालय था। हालांकि अभी भी उनको नाजियों के कंसंट्रेशन कैंप और गैस चैंबर आकर्षित करते रहते हैं।) 1949 से ही आरएसएस और हिंदुत्ववादियों की सर्वोच्च इच्छा आकांक्षा इसराइलियों का दर्शन करना रहा है। इजरायल की दो बार यात्रा करके मोदी जी ने अपने वैचारिक पूर्वजों की अभिलाषा को पूरा कर दिया है। अब उनके पूर्वज शांतिपूर्वक अनंतलोक में चिरनिद्रा में सो सकेंगे।

जो भोले लोग मोदी जी की वर्तमान इजरायल यात्रा के उद्देश्य को लेकर आश्चर्य प्रकट करते हुए कह रहे हैं कि इस समय उन्हें इसराइल नहीं जाना चाहिए था, क्योंकि युद्ध के बादल इस खित्ते में मंडराते हुए दिखाई दे रहे थे, इसलिए तेल अवीव की यात्रा के मकसद को लेकर प्रश्न उठा रहे हैं। उन्हें इस यक्ष प्रश्न का उत्तर अवश्य मिल गया होगा, जब मोदी जी ने इसराइल को फादर ऑफ द नेशन घोषित कर दिया।

ऐसे विश्लेषक उस खुले सत्य से आंख मूंद लिए थे जो पिछले 80 वर्षों से संघ परिवार द्वारा खुलेआम कहा जा चुका था। जिसे मोदी ने इजरायली संसद में बोलते हुए स्पष्ट किया कि भारत इजराइल के साथ खड़ा था, खड़ा है और भविष्य में भी खड़ा रहेगा। (यहां भारत की जगह संघ पढ़िए।) यह उसकी प्रतिबद्धता है। भविष्य में भी वह इस पर खरा उतरेगा। इस बात पर खुशी प्रकट करते हुए बेंजामिन नेतन्याहू ने मोदी जी को अपना भाई घोषित कर दिया है। सच बात है कि जिन्हें जीनोसाइड पसंद होता है, वे दुनिया के किसी भी कोने में हों सहोदर भाई ही होते हैं।

दूसरी बड़ी घोषणा मोदी जी ने भारत के हिंदुत्ववादियों का भ्रम दूर करने के लिए की है — “कि इसराइल इज फादर ऑफ द नेशन और भारत इज मदर ऑफ द नेशन”। यानी संघियों को उनका जैविक पिता मिल गया है, जो हिटलर की आत्महत्या के बाद से अनाथ हो गए थे। क्या गजब का अनुसंधान है, जिसे आज तक दुनिया के बड़े से बड़े समाजशास्त्री, दार्शनिक और इतिहास-अध्येता समझने में असफल रहे।

यही तो मोदी जी की योग्यता और महानता है कि वह बड़े से बड़े और जटिल से जटिल सवालों का समाधान सेकंड भर में निकाल लेते हैं। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद विश्व मोदी जी की कुशाग्र बुद्धि और युद्ध रणनीति का लोहा मान ही चुका है, जब उन्होंने भारतीय फाइटर विमान के रडार से बच निकलने का नायाब नुस्खा सुझाया था। खैर! मोदी जी तो मोदी जी हैं — भक्तों के कल्पना लोक के नॉन-बायोलॉजिकल महामानव। न भूतो न भविष्यति।

मोदी जी की यात्रा को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं, खास तौर से उस समय जब मोदी जी देश के अंदर गहरे राजनीतिक संकट से जूझ रहे हैं। संसद में तीन महिला सांसदों के कथित संभावित हमलों से डर कर राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का बहिष्कार कर सुर्खियों में हैं। वहीं दूसरी तरफ अमेरिका से होने वाली ट्रेड डील के प्रश्न पर सरकार बुरी तरह से घिरी हुई है। ट्रंप बार-बार ट्रेड डील को लेकर नए-नए खुलासे किए जा रहे हैं। वे कह रहे हैं कि भारत ने रूस से तेल न लेने का वादा किया है, जिसकी मॉनिटरिंग के लिए ट्रंप ने मंत्रियों के एक समूह की भी घोषणा कर दी है।

भाजपा के आर्थिक एसेट अडानी अमेरिका में आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहे हैं और गुरुपतवंत सिंह पन्नू के केस में निखिल गुप्ता के द्वारा की गई स्वीकारोक्ति के कारण भारत की सबसे प्रतिष्ठित खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ सवालों के घेरे में है। रॉ के अधिकारी विकास यादव पर हत्या की सुपारी देने का अभियोग है, जिसकी पुष्टि निखिल गुप्ता ने अपने इकबालिया बयान द्वारा कर दी है।

कोढ़ में खाज तो अमेरिका में न्यायिक आदेश पर एपस्टीन फाइल के खुलने के साथ मोदी मंत्रिमंडल के मंत्री हरदीप सिंह पुरी, मोदी के विश्वसनीय मित्र अनिल अंबानी और स्वयं मोदी जी सवालों के घेरे में आ गए हैं। मोदी जी 2017 में पहली बार इसराइली यात्रा गए। उसके बाद अमेरिका में हाउडी मोदी इवेंट्स का आयोजन हुआ था। इसराइल की यात्रा और ट्रंप के विश्वसनीय सलाहकार बेनिन से मिलवाने को लेकर जेफ्री एपस्टीन की भूमिका ने मोदी की यात्राओं को संदिग्ध बना दिया है।

यही नहीं, ट्रंप की कृपादृष्टि हासिल करने के उद्देश्य से 2017 में इजरायली यात्रा में जो कुछ हुआ, उसके तार जिस तरह से बदनाम सेक्स ऑफेंडर एपस्टीन से जुड़ रहे हैं, उससे मोदी और उनकी सरकार तथा सहयोगियों की नियति, नीति और चरित्र पर गंभीर सवाल खड़ा हो गया है। आश्चर्य है कि अभी तक हरदीप सिंह पुरी के अलावा किसी ने सफाई में अपना मुंह नहीं खोला है। इन खुलासों ने मोदी के संरक्षण में चल रहे संदिग्ध क्रियाकलापों की श्रृंखला पर से पर्दा हटा दिया है, जिससे मोदी सरकार भारी दबाव झेल रही है। एक चतुर खिलाड़ी की तरह ट्रंप और नेतन्याहू मोदी जी की मजबूरियों का भरपूर दोहन करने में लगे हैं।

यहां यह ध्यान रखना चाहिए कि जेफ्री एपस्टीन मोसाद का एजेंट था और मोसाद इजरायली खुफिया एजेंसी है, जो दुनिया भर में हत्याओं, आपराधिक कृत्यों और नेताओं का इस्तेमाल करने के लिए बदनाम रही है। जिसका उद्देश्य दुनिया भर में इजरायली कूटनीति, व्यापार व संबंधों को सुदृढ़ करने के लिए लॉबिंग करना था। जिसके लिए उसने इजरायली सरकार और मोसाद के सहयोग से एक नेटवर्क खड़ा किया था, जिससे दुनिया भर के राजनेताओं, मंत्रियों, उद्योगपतियों, कलाकारों और सेलिब्रिटीज को अपने जाल में फंसाया जा सके। जेफ्री एपस्टीन वर्तमान पूंजीवादी सभ्यता के जहरीले, बदबूदार मनुष्यता-विरोधी तहखाने का घिनौना ढक्कन है, जिसके खुलते ही पूंजीवादी सभ्यता का खूनी और विद्रूप चेहरा दुनिया के सामने आ गया है।

आज इस जहरीले दबे-छुपे तहखाने के मवाद में डूबे विश्व की अनेक हस्तियों के चेहरे विकृत और खूंखार लगने लगे हैं, जो कल तक वैश्विक मंचों पर पूंजीवादी सभ्यता-संस्कृति की महानता और मानवीयता के कसीदे पढ़ रहे थे और इस सभ्यता की श्रेष्ठता का ढोल बजा रहे थे। आज पूंजीवादी लूट और बर्बरता तथा घिनौनी सभ्यता को बचाने के लिए कुछ या तो इस्तीफा दे रहे हैं या उन पर आपराधिक केस दर्ज हो रहे हैं। लेकिन इसराइल और अमेरिका, जो इस सभ्यता के सबसे खूंखार चेहरे हैं, ट्रंप और उसका गिरोह अपराधियों और गुंडों की तरह विरोधी विचारों वाले मुल्कों पर युद्ध थोप कर अपने आपराधिक कृत्यों से बच निकलना चाहते हैं। पश्चिमी लोकतंत्र का असली चेहरा विश्व जनगण के समक्ष नंगा हो जाने के बाद वे विध्वंसक युद्ध थोप कर खूनी राष्ट्रवाद की आड़ में बच निकलना चाहते हैं। खैर! इस पर फिर कभी!

यहां एक बात हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि संघ नीति के तीन स्थायी तत्व हैं। एक — शक्तिशाली के समक्ष समर्पण। दो — दमन और असमानता के तंत्र को स्वाभाविक और नैसर्गिक मानना। तीन — धार्मिक अल्पसंख्यक-विरोधी नैरेटिव को विचार-विमर्श और रोजमर्रा के सामाजिक-राजनीतिक व्यवहार का स्थायी तत्व बना देना। इसलिए हम देखते हैं कि 2014 से ही मोदी सरकार के समाज, राज्य और लोकतंत्र की संस्थाओं के संचालन में यही तीन निर्णायक दिशा-निर्देशक तत्व सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, जो संविधान और उसकी प्रस्तावना में वर्णित दिशा-निर्देशों के निषेध को स्वाभाविक बना देते हैं। हमें मोदी की इजरायली यात्रा को उपर्युक्त परिप्रेक्ष्य में देखना और इन तीन बुनियादी मापदंडों पर परखना चाहिए।

मोदी की इजरायली यात्रा ऐसे समय में हुई जब नेतन्याहू अंतर्राष्ट्रीय क्रिमिनल कोर्ट द्वारा युद्ध अपराधी घोषित किया जा चुका है। विश्व भर के 124 देशों ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी किया है और वह उन देशों की यात्रा पर नहीं जा सकते। यही कारण है कि इजरायल समर्थक पश्चिमी देशों के राष्ट्राध्यक्ष भी नेतन्याहू से मिलने से बचते रहे हैं। अगर वे नेतन्याहू इन देशों में जाते हैं तो तुरंत गिरफ्तार कर लिए जाएंगे। उन पर गाजा में लगभग 73 हजार फिलिस्तीनियों के कत्ल का इल्जाम है, जिसमें 40% से ज्यादा महिलाएं और बच्चे हैं।

नेतन्याहू दुनिया के सबसे बदनाम, क्रूर नरसंहारों में लिप्त नस्लवादी प्रधानमंत्री हैं और जियोनवादी नस्लवाद के संरक्षक हैं। उनके नेतृत्व में आतंकवादी यहूदी राष्ट्र इजरायल द्वारा पश्चिम एशिया यानी खाड़ी देशों में लाखों निर्दोष नागरिकों का कत्ल किया गया है। लाखों फिलिस्तीनियों के कत्ल और विस्थापन के साथ उसने लेबनान, सीरिया, जॉर्डन, मिस्र सहित कई देशों पर हमला किया और संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रस्तावों का उल्लंघन किया है। नेतन्याहू का अस्तित्व इस्लाम-विरोध पर टिका है। नेतन्याहू के ऊपर इजरायल में भ्रष्टाचार के मुकदमे हैं, जिससे वह फिलिस्तीनियों के कत्लेआम और इस्लाम-विरोध की आड़ में बच निकलना चाहता है। इजरायल यूएस का ऐसा लठैत है, जिसके द्वारा वह अरब देशों पर नियंत्रण करता है और डॉलर का अधिपत्य अरब तेल संपदा पर चलता है।

चूंकि इसराइल और संघ परिवार का अस्तित्व इस्लाम-विरोध पर टिका है, इसलिए दोनों के बीच की एकता स्वाभाविक लगती है। यहां इस ऐतिहासिक तथ्य पर ध्यान देने की जरूरत है कि जब हिटलर द्वारा यहूदियों का नरसंहार किया जा रहा था, तो संघ के विचारक यहूदियों के जेनोसाइड से बहुत उत्साहित थे। उनका मानना था कि हिटलर ने जिस तरह जर्मन राष्ट्रवाद के झंडे को बुलंद किया है और सेमिटिक नस्ल के यहूदियों का सफाया करके जर्मन राष्ट्र की आत्मा को पुनर्जीवित किया है, उससे भारत बहुत कुछ सीख सकता है।

आज जब नाजीवाद का अस्तित्व खत्म हो चुका है और दुनिया में अमेरिका के नेतृत्व में नए तरह का खूनी आधिपत्य चल रहा है, तो संघ परिवार अमेरिकी-इजरायली धुरी का प्रवक्ता और प्रशंसक बन गया है। इसलिए सरल मन और पवित्र हृदय वाले उदारवादी मोदी की इजरायली यात्रा के समय को लेकर दुखी हैं। उन्हें होने दीजिए। वस्तुतः हम देखते हैं कि दुनिया में फासीवादी और मानव-विरोधी ताकतें इसी तरह के दोगले व्यवहार प्रकट करती रही हैं।

प्रसंगवश समझ लेना चाहिए कि भारत में हिंदुत्व फासीवाद के अभ्युदय का एक महत्वपूर्ण कारक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्लामोफोबिया का बढ़ना भी था, जिसमें 9/11 के अलकायदा द्वारा अमेरिका पर किए गए आक्रमण की महत्वपूर्ण भूमिका थी। जब अलकायदा और तालिबान के साथ अमेरिका का अपवित्र गठबंधन भंग हो गया। वैसे सोवियत संघ के विघटन के बाद से अमेरिकी साम्राज्यवादियों के नेतृत्व में शुरू किए गए उदारीकरण के दौर में सभ्यताओं के संघर्ष का नैरेटिव पूंजीवादी विचारकों द्वारा विकसित किया गया, जिसे ईरान की इस्लामी क्रांति और उसी समय अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप के बाद अमेरिका के सहयोग से पाकिस्तान प्रशिक्षित तालिबानियों के साथ बढ़ते टकराव में नया जीवनदान मिला था।

जब तक सीआईए और मोसाद प्रशिक्षित अलकायदा और तालिबान अमेरिकी विश्व रणनीति के अनुरूप काम करते रहे, तब तक ये उनके लाडले थे। लेकिन ज्यों ही अफगानिस्तान में तालिबान एक राज्य के रूप में संगठित हो गए, त्यों ही इस्लामी राष्ट्रवाद का कॉन्सेप्ट क्रिश्चियन और यहूदी राष्ट्रवाद से टकरा गया और ये दोनों एक-दूसरे के शत्रु बन गए। यहां से दुनिया में एक नए तरह का संघर्ष शुरू हुआ है। अलकायदा के अमेरिका पर हमले के बाद अमेरिका ने इराक और अफगानिस्तान पर हमला कर दिया और वहां की राज्य व्यवस्थाओं का ध्वंस हो गया, जिसे आज हम नई मंजिल और नए कंटेंट के साथ ईरान पर अमेरिकी-इसराइली हमले के रूप में नई मंजिल में पहुंचते हुए देख रहे हैं।

इस संदर्भ की चर्चा इसलिए इस लेख में की गई है कि भारत के हिंदुत्ववादियों के पाखंडी राष्ट्रवाद का गुब्बारा इस वैश्विक ठोस धरातल से टकराकर कैसे फुस्स हो गया है, इसे देखना एक दिलचस्प मंज़र से रूबरू होना है। भारत भी आतंकवाद से पीड़ित रहा है, जिसे भारत में “हर आतंकवादी मुसलमान ही क्यों होता है” जैसे जुमलों में आप सुन सकते हैं। (हालांकि भारत में हुई आतंकवादी घटनाओं की सघन और ईमानदार जांच-पड़ताल की जरूरत है।) समय के विकास की वर्तमान मंजिल में यह बात और संदिग्ध हो जाती है, जब आरएसएस और भाजपा अपने कट्टर शत्रु तालिबानियों के साथ गहरा रिश्ता बना लेते हैं। अचानक पिछले कुछ दिनों पहले तालिबान सरकार के विदेश मंत्री भारत सरकार और संघ के निमंत्रण पर दो हफ्ते के दौरे के लिए भारत आए थे।

हमें यह नहीं पता है कि उन्हें राजकीय अतिथि के रूप में बुलाया गया था या वे किसी खास प्रक्रिया के तहत भारत आए। वैश्विक पूंजीवाद के जटिल दौर में विभिन्न देशों, संगठनों और संस्थाओं के आपसी अदृश्य संबंधों और हितों के साथ बने अदृश्य तंत्र के दौर में चीजें किस तरह से घटित होती हैं, इसे समझना सामान्य नागरिक के लिए संभव नहीं होता। यही कारण है कि प्रत्यक्षतः जैसा घटित होता हुआ दिखाई देता है, शायद वैसा होता नहीं है।

इसलिए जब तालिबानी विदेश मंत्री को जगह-जगह आरएसएस के संस्थानों में बोलने का अवसर मुहैया कराया गया, तो यह दृश्य अपने आप में जटिल संबंधों की परतें खोलता है। आरएसएस की नीति-निर्धारक संस्था विवेकानंद फाउंडेशन में उन्हें सम्मान के साथ आमंत्रित किया गया, जहां उनके वक्तव्य को विस्तृत तौर पर सुना गया और सराहा गया। आपको यह हिंदुत्ववादियों के चिंतन और व्यवहार में आए अचानक किसी मोड़ के रूप में दिखाई दे सकता है, लेकिन सच्चाई ठीक इसके उलट है।

अमेरिका के नेतृत्व में चल रहा अंतरराष्ट्रीय वहाबी इस्लामिक आंदोलन ही वह केंद्रीय धुरी है, जिस पर वर्तमान समय में संघी हिंदुत्व का पहिया चक्कर काट रहा है। इसी कट्टरवादी वहाबी इस्लाम से भारत के हिंदुत्ववादी वर्तमान समय में प्रेरणा ले रहे हैं और हिंदू धर्म को एक सेमेटिक धर्म में बदलने की कोशिश कर रहे हैं तथा उसे कट्टरतावादी सशस्त्र हिंसक आंदोलन में बदलने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं।

प्रत्यक्षतः वे भारत में इस्लाम-विरोध से पोषण तत्व ग्रहण करते हैं। राजनीतिक लाभ के लिए उनके खिलाफ शत्रुतापूर्ण संबंधों में दिखाई देते हैं, लेकिन अवसर मिलते ही यूएई, सऊदी अरब, कतर जैसे देशों के साथ सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंधों में बंध जाते हैं, जो अंततः राजनीतिक इस्लाम के सबसे कट्टर मॉडल काबुल के साथ रिश्तों के रूप में प्रकट हुआ है। आपको लग सकता है कि तालिबान के साथ पाकिस्तान का टकराव है, इसलिए “शत्रु का दुश्मन दोस्त होता है” के प्रचलित व्यवहार के संदर्भ में भारत के व्यापक हितों को ध्यान में रखते हुए तालिबान से दोस्ती करना भारत के लिए लाभदायक होगा। लेकिन आश्चर्य है कि जिस दौर में भारत के रिश्ते अपने पड़ोसी देशों के साथ लगातार बिगड़ते गए हैं, वहीं तालिबानियों के साथ अचानक मोहब्बत इस बात को दिखाती है कि सभी कट्टरपंथी एक-दूसरे के सहयोगी और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष मददगार हुआ करते हैं।

इसलिए जहां तक राजनीतिक इस्लाम हमारे हिंदुत्ववादियों के लिए सत्ता तक पहुंचने का आधार बना, वहीं सत्ता हासिल करने के बाद दोनों तरह के कट्टरपंथी एक-दूसरे के सहयोगी हो गए। भारत में गरीब ठेले-खोमचे वाले मुसलमानों के साथ हो रहे कायरतापूर्ण हमले और विस्तृत पैमाने पर मुसलमान-विरोधी सरकारी तथा गैर-सरकारी अभियानों को देखते हुए तालिबानियों को गले लगाना मजहबी कट्टरपंथियों के डीएनए के एक होने को प्रकट करता है।

दूसरा महत्वपूर्ण कारण है कि कट्टरपंथी इस्लाम और संघी हिंदुत्व दोनों वैश्विक फलक पर अमेरिकी-इजरायली गठबंधन के साथ दृश्य-अदृश्य संबंध में बंधे हैं। प्रधानमंत्री मोदी का इस जटिल मोड़ पर तेल अवीव की यात्रा पर जाना और वहां से इसराइल के साथ एकता की घोषणा करना हिंदुत्ववादियों के पुराने चरित्र को प्रकट करता है, जब वे भारत में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अंग्रेजों के साथ मजबूत रिश्ते में बने हुए थे। उसके ठीक बाद में ईरान पर इसराइल और अमेरिका के बर्बरता-पूर्ण हमले को देखकर ऐसा लगता है कि हमारा देश एक नए तरह की वैश्विक रणनीति पर अमल कर रहा है।

हम देख रहे हैं कि पश्चिम एशिया और खाड़ी के 90% मुस्लिम देशों की सरकारें शीत युद्ध के काल से ही अमेरिका के साथ खड़ी रही हैं। ये सभी देश नाटो के सदस्य हैं, जो विशुद्ध रूप से एक सैनिक गठबंधन है, जिसके तहत इन देशों में अमेरिकी सैनिक अड्डे और फौज तैनात हैं। क्या व्यवहार में भारत इस गठबंधन का सदस्य हो रहा है? अगर ऐसा है, तो यह भारत को भविष्य में एक नए खतरे के सामने खड़ा कर देगा। जिस तरह से खाड़ी देशों को पेंटागन का संरक्षण हासिल रहा है, क्या भारत भविष्य में किसी बड़े सैन्य गठजोड़ का अंग बनने की तरफ बढ़ रहा है? अगर ऐसा होता है, तो भारत अमेरिकी विश्व रणनीति का पिछलग्गू हो जाएगा। वर्तमान समय तो कुछ ऐसा ही संकेत दे रहा है, जब भारत काबुल से तेल अवीव होते हुए कतर, यूएई, सऊदी अरब के साथ घनिष्ठ होता जा रहा है।

तो फिर स्पष्ट है कि भारत पीड़ित फिलिस्तीनियों और अमेरिकी-इजरायली हमले के समय ईरान, लेबनान का साथ छोड़ते हुए अंततः हमलावर और लुटेरी ताकतों के साथ जा मिला है। इस अर्थों में हम मान सकते हैं कि पिछले 12 वर्षों में मोदी यानी संघ-नीति भारत सरकार नई दिशा पर अमल करती हुई दिखाई दे रही है, जिसका परिणाम विश्वभर में समानता, बराबरी और मुक्ति चाहने वाली जनता के साथ हमारे अलगाव में प्रकट होगा। लगता है इतिहास ने एक चक्र पूरा कर लिया है। गुलाम भारत में अंग्रेजों के शरण में रहने वाला हिंदुत्व अंततः “अमेरिका शरणम् गच्छामि” तक पहुंच गया है, जहां वह खीं-खीं करते हुए गले लिपट विदेश नीति पर चलकर सुकून महसूस करेगा, जैसा कि दिशाहीन विदेश नीति की स्थिति में भारत को देख रहे हैं।

यही काबुल से तेलअवीव तक की मोदी मार्का विदेश नीति की यात्रा का स्वाभाविक परिणाम है। जिस समय अमेरिकी-इजरायली युद्ध-पिपासु गठजोड़ के ईरान पर किए गए हमले से वैश्विक शांति गंभीर खतरे में है, तो भारत की गले लिपटने वाली विदेश नीति की दर्शनीयता दिखाई देने लगी है। जब हमारा देश स्वतंत्रता संघर्ष के मैदान में था, तो विभिन्न देशों में चल रहे मुक्ति संघर्षों के पक्ष में खड़े होकर भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिस कारण से विश्व भर में हमें सम्मान मिलता था।

गरीब और कमजोर देश भारत की तरफ आशा भरी निगाहों से देखते थे। 12 वर्षों में हिंदुत्ववादी मोदी सरकार की अमेरिका-परस्ती के कारण हमारा महान देश हत्यारे को हत्यारा, हमलावर को हमलावर और लुटेरे को लुटेरा कहने का साहस खो बैठा है। 145 करोड़ आबादी वाले महान देश की सरकार इस स्तर तक कमजोर हो चुकी है कि 180 मासूम स्कूली बच्चियों की मौत पर शोक प्रकट करने की शक्ति और सामर्थ्य खो बैठी है। तो ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह खामनेई की हत्या पर शोक प्रकट करने का औपचारिक साहस की उम्मीद हम अपने प्रधानमंत्री से कैसे कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में तथाकथित हिंदुत्व राष्ट्रवादी सरकार की विवशता पर शोक ही प्रकट किया जा सकता है।

(जयप्रकाश नारायण वामपंथी कार्यकर्ता और किसान नेता हैं।)

Leave a Reply